भारतरत्न डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर जयंती हिंदी भाषण bharatratna do babasaheb ambedkar 

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भारतरत्न डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर जयंती हिंदी भाषण bharatratna do babasaheb ambedkar 

आज के कार्यक्रम के अध्यक्ष महोदय तथा मेरे क्लास के प्रिय छात्र एवं छात्रायें, मेरे आदरणीय गुरूजी सभी क्लास के शिक्षक वर्ग और मुति के रूप में भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर इनकी प्रतिमा.

में आज आप सभी के सामने डॉ. बाबासाहेब के जीवन परं कुछ खास महत्वपूर्ण बाते बताने जा रहा हूँ कृपया आप ध्यान से सुनेंगे यहीं आप से गुजारिश करूँगा।

उन दिनों की बात है, जब एक समय का निवाला आदमी बडी मुश्किल से खाता था, ऐसे समय सुभेदार रामजी आंबेडकर को १४ वे रत्न करके १४ एप्रिल १८९१ को मध्य प्रदेश के महु गांव में भिमराव का जन्म हुआ। दोस्तो ये बालक कोई साधारण बालक नहीं थे। उनकी माता का नाम भिमाबाई था। कितना संयोग था की माता का नाम भिमाबाई और बेटे का नाम भिमराव था। अपने माता-पिता की १४ वी संतान और १४ तारीख को पैदा होना

यह अचंबे की बात बर्डी अचंबे वाली है। ऐसा बहुत कम लोगों के साथ होता है।

दोस्तों में यह भी बताना चाहूंगा की बाबासाहेब जब स्कूल में गये तब इस दुनिया में हमारे देश में एक बहोत बडी बिमारी थी और वह थी छुवाछुत की, भिमराव को स्कूल अंदर नहीं बैठने देते थे। स्कूल के छात्र भी उनसे काफी दूर बैठकर मास्टरजी का व्याख्यान सुना करते थे। आप बताओं दोस्तों इतने बडे महान इंसान को इतना अपमान सहन करना पडा, ये हमारे लिये बडे दुःख की बात है। आगे वह १९०७ में मॅट्रिक पास हो गये। उनके पिताजी ने १९०८ की शादी अनंतराव की बेटी रमाबाई से कराई। दोस्तों रमाबाई अत्यंत गरीब घर की बेटी थी। वह बाबासाहेब को हमेशा उनके पढाई में मदद किया करती थी। महाड के चवदार तालाब का पानी पीने की मनाई थी। बाबासाहेब ने वह भी खुला कर दिया। मंदिर में और कुओं में पानी भरने का अधिकार दिलवा दिये। दोस्तो डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भारतीय संविधान की निर्मीती स्वयं अपनी पेन की कलम से २ साल ११ महिने १८ दिन में लिखे यह हमारे लिये गर्व की बात है। दोस्तों, साहेब ने प्रतिज्ञा ली थी की, जिस हिंदू समाज ने मेरे दलित महार जाती के लोगो के उपर अत्याचार किया है। उस हिंदू समाज में मुझे हिंदू बनकर मरना नहीं है। और उन्होंने १३ अक्टूबर १९३५ में येवले शहर में धमांतर की घोषणा कर दी गई थी। उस समय समाज के लोगों को भ्रम हो गया था की बाबासाहेब कौन से धर्म में प्रस्थान करेंगे? १४ अक्टूबर १९५६ को नागपूर के दिक्षाभूमी मैदान पर भगवान बुध्द का बौध्द धर्म की दिक्षा उन्होंने लोगों की उपस्थिती में ग्रहण किये। दोस्तो बाबासाहेब के जीवन मे और एक खास बात बताना चाहता हूँ, वह है आंतरजातीय विवाह जिसे हम आंतरजातीय विवाह जैसे अंग्रेजी में इन्टरकास्ट मॅरेज कहते है। रमाबाई के निधन के कुछ दिन बाद बाबासाहेब ने १५ अप्रैल १९४८ को डॉ. सविता कबीर से दुसरी शादी कोर्ट से कर ली थी। दोस्तो कुछ दिन बाद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की तबीयत खराब होती गयी वे अपनी लाठी पकडकर चलते थे। अंत में बाबा साहब ६ डिसेंबर १९५६ मे बाबसाहेब हम सब को हमेशा के लिये छोड कर चले गये। उनका पार्थिव शरीर विशेष विमान से दिल्ली से मुंबई दादर चौपटी लाया गया। इस महात्मा के दर्शन के लिए १०-१२ लाख स्त्री-पुरूष इकठ्ठा हुए थे। इनका यात्रा कुल तीन मील की थी। अंतिम संस्कार दादर चौपाटी पर बौध्द रिती रिवाज से किया गया। उस दिन से उस दादर भूमि को ‘चैत्यभूमि’ के नाम से जाना जाता है। ऐसे महान आर्दश इन्सान को मेरा कोटी कोटी सादर प्रणाम करता हूँ। और मेरा भाषण समाप्त हुआ ऐसा में जाहिर करता हु|

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